Dushyant Kumar Ghazal

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रागड़ में सर्दियो की दुपहरी में तकरीबन 50 छात्रो का जमावड़़ा, छोटे से स्टेज पर एक नया लड़का फीस बढ़ाये जाने पर विरोध कर रहा है
हाथ दिखा दिखा के यूनिवर्सिटी के पढ़ाई को ललकार रहा था कि कहा तो यह पढ़ाया जाता है कि शिक्षा पर सबका अधिकार है और यह सरकार और यूनिवर्सिटी ने भी कहा था शिक्षा का अधिकार सबको मिलेगा लेकिन रातो रात फीस इतनी बढ़ा दी गयी कि घर में चार भाई बहन हो तो कोई एक ही पढ़ सकता है सरकारे जब वोट माॅगने आती है तो गरीबी हटाने का वादा करती है सरकार बनते ही सबसे पहले गरीब ही चुभने लगते है और दिया गया आश्वासन और अब संय़त्र

कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए

dushyant kumar image, delhi, 2020


उनकी इस अंतिम लाइन उस पच्चास के पुवाल में जैसे चिंगारी लगा देती है और जो भीड़ 50 की थी सैकड़ो मे तबदील हो जाती है वी सी का घेराव होता है धरने दिये जाते है
और यूनिवर्सिटी अपना कदम वापस ले लेती है फीस नही बढ़ायी जाती है
वैसे मै दुष्यन्त जी की कई कविताओ को बहुत पहले से सुना और अपने स्पीच में प्रयोग भी किया करता था लेकिन वो लगाव उनको पूरा पढ़ने के बाद और बढ गया


यहाँ दरख़्तों के साए में धूप लगती है
चलें यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

न हो कमीज तो पाँव से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए


वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेकरार हूँ आवाज में असर के लिए

जिएँ तो अपने बगैचा में गुलमुहर के तले
मरें तो गैर की गलियों में गुलमुहर के लिए

Dushyant Kumar Ghazal

dushyant image, delhi, 2020

वैसे ये आंदोलन व संघर्षी विरोधाभाष भारत के युवानो में हमेशा देखने को मिलते है इन आंदोलन ने हमेशा एक नयी क्रांति दी है चाहे वो 70 का जे पी का आंदोलन रहा हो या 2011 का अन्ना का आंदोलन हो
और दुष्यंत जी की लाइने हमेशा लगता है उसी परिस्थिति के लिखी गयी हो
क्योकि परिस्थितियो के सिर्फ तारीख, जगह और चित्रकार बदले है
भगत सिंह के सामने परेदेशी अंग्रेज थे और आजादी के बाद देशी अंग्रेज है उन्हें भी शासन पसन्द था इन्हे भी
लाठिया मारने वाले पहले अंग्रेज के सिपाही थे और अब भ्रष्टाचारी नेताओ और अफसरो की लाठिया थी
लेकिन दुष्यंत को गाने वालो के सामने लाठिया टुट गयी लेकिन उन्होने तराने गाना नही छोड़ा

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

dushyant kumar image, delhi, 2020

दुष्यंत जी की ये आवाज और वो भी गजल में जिसकी परिभाषा मेरी नजरो मे बड़ी ही खराब थी
मेरी लिए गजल रात को आराम से सोते समय लगाया हुआ गाना या उन पुराने फिल्मो की भाॅति एक हाथ में गिलास और दूसरे हाथ में नाचने वाली की जुल्फे
अचानक दुष्यंत जी इन गजलो की नियती ही बदल दी जिस हाथ में शराब के गिलास की जगह संविधान था और दूसरे हाथ की मुटठी बंधी हुयी और इंकलाब के तराने
तवायफो के कोठो पर गायी जाने वाली गजल अब गली चैराहो और नुक्कड़ो पर गायी जाने लगी हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

दुष्यंत जी कुछ कविताओ में प्यार भी मिलता है जैसे एक बार लेक्चर के पहले दिन हिन्दी के अध्यापक सबसे परिचय ले रहे थे और जब दुष्यंत जी की बारी आयी तो उन्होने कहा
कि मै जिला बिजनौर के उस क्षेत्र का निवासी हूॅ जहा दुष्यंत और शकुन्तला की प्रणय लीला हुयी थी और इतेफकाक ये है कि मेरा भी नाम दुष्यंत है परदेशी उपनाम से कविता लिखता हूॅ अब तक आपके लिए भी परदेशी ही हूॅ लेकिन आगे परदेशी रहने का इरादा नहीं है प्रियतम बन जाने का इरादा है
ये परिचय सुनते ही सभी ठहाके लगा रहे थे और लड़किया दबे होठो तले मुस्कराने लगी
अपनी पत्नि के लिए भी एक शेर लिखा था


तुमको निहारता हू सुबह से रितम
अब शाम हो रही है मगर मन नही भरा

Dushyant Kumar Ghazal

 kumar image, delhi, 2020

लेकिन मुश्किल ये है कि जब हवाओ में गरीबी बेकारी और भूखमरी का जहर घुला हो तो एक अच्छा कलमकार रूमानियत के हसीन चेहरे को ज्यादा देर तक निहार नहीं सकता


मुझ से पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब, न माँग

अनगिनत सदियों के तारीक बहिमाना तलिस्म
रेश-ओ-अठलस-ओ-कमखाब-ओ-बाजार में जिस्म
खाक में लितड़े हुए खून में नहलाए हुए

लौट जाती है इधर को भी नजर क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न, मगर क्या कीजे – २
और भी दुख हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब, न माँग

Dushyant Kumar Ghazal 2020 with Some Stories

dushyant kumar image, delhi, 2020

इंकलाबी कविता वो ये नहीं है जो ये बताए दुख कितना है इंकलाबी कविता वो है जो दुख से लड़ने के लिए नशो में बिजलीया भर दे
और एक अच्छा कवि भी यही करता है और दुष्यंत जी भी यही कर रहे थे
और उनके भी हालात इसके एकदम विपरीत थे और उनको ऐसा करने की इज्जाजत नहीं दे रहे थे वो खुद सरकारी नौकरी कर रहे थे जाहिर है सरकार के खिलाफ बोलना जुर्म की जद में आता था नौकरी जा सकती थी परिवार दर बदर हो सकता है
लेकिन दुष्यंत गालिब नहीं थे क्योकि इन्ही डर की वजह से गालिब ने कसीदे पढ़ने शुरू कर दिये थे


गालिब वजीफा खान हो
दो शाह को दुआ
वो दिन गये कि
कहते थे नौकर नहीं हूॅ मै

यानि गालिब पैसे चाहिए वजीफा चाहिए तो शाह को दुआए दो वो दिन लद गये जब तुम खुद को नौकर नहीं समझते थे
इंदिरा गांधी की सरकार थी मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने बुलाकर समझाया कि तुम अपने कलम से खुन टपकाना बंद करो सरकार के खिलाफ जहर न फैलाओ
लेकिन दुष्यंत चुप कहां होने वाले थे
वो और बागी हो गये


ए जुबां हमसे सी नही जाती
जिंदगी है कि जी नही जाती
एक आदत सी बन गयी है तु
और आदत कभी नही जाती
यहा तु बगावत के लिए कहा गया है

बगावत तो दुष्यंत जी की कविताओ में किनारो को तोड़ता हुआ चीरता हुआ हमेशा सामने आया है

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

हालात से समझौता करना कभी दुष्यंत जी ने नहीं सीखा
वो इंमरजेसी में भी इंदिरा गांधी के खिलाफ बेधड़क लिख रहे थे


एक गुड़िया की कई कठपुतलियो में जान है
आज शायर ये तमाशा देख के हैरान है
यहां गुड़िया इंदिरा गांधी के लिए कहा गया है

खास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।

एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
इस अँधेरी कोठारी में एक रौशनदान है।

मस्लहत-आमेज होते हैं सियासत के कदम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है।

इस कदर पाबंदी-ए-मजहब की सदके आपके
जब से आजादी मिली है, मुल्क में रमजान है।

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिन्दुस्तान है।

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं हर गजल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।

Dushyant Kumar Ghazal

dushyant kumar , delhi, 2020

दुष्यंत हमेशा उन लोगो की आवाज बने जिसको कभी उंची उंची संसदो ने अपना माना ही नही
यहा तक पहुचते पहुचते बजट का गजट निकल जाता था
वो हमेशा खेतिहर किसान मजदुर कुली

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा,
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा

यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

कई फाके, बिता कर मर गया जो उसके बारे में
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं,ऐसा हुआ होगा

यहाँ तो सिर्फ गूँगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने वहाँ पर किस तरह जलसा, हुआ होगा


23 12 1975
वो सारे कागज झुठे है जो दुष्यंत को मरा हुआ बताते है
दुष्यंत न मरे है ना मर सकते है

क्युॅ सॅवारी है ये चंदन की चिता मेरे लिए
मै कोई जिश्म नही हूॅ जो जलाओगे मुझे
राख के साथ बिखर जाउगा मैं दूनिया में
जहा खाओगे ठोकर वही पाओगे मुझे

जब भी सियासत इंसानियत के सीने पर पैर रखकर आगे बढकर जरूरत करेगी कही किसी के सीले हुए होठ खुल जाऐगे और उन बागी होठो से दुष्यंत फुट पड़ेगे
फिर लोग जुटेगे
फिर दुष्यंत गाये जायेगे
फिर आक्रोश में मुट्ठी तन जाएगी
फिर पर्वतो की तरह पीर पिघलेगी
और फिर कोई गंगा बन जायेगी

कई क्रातियो की जान रही है दुष्यंत की कलम और आगे भी रहेगी
एक पंक्ति लाखो के भीड़ के खुन में उबाल ला दे

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