Kabir Das ke Dohe

Contents : 
संत कबीर दास जी का जन्म व मृत्यु 
कबीर दास के कुछ महान लेखन
कबीर जी का धर्म
कबीरदास जी के गुरू
संत कबीरदास जयंती कब मनाते है
कबीर दास जी के दोहे
साधु महिमा
आचरण महिमा
संगति महिमा
सेवक महिमा
भक्ति महिमा
व्यवहार महिमा
काल महिमा
उपदेश महिमा
कबीर दास जी के दोहे का पी डी एफ
kabir amritvani, delhi, 2o2o

संत कबीर दास जी का जन्म व मृत्यु Kabir Das Biography in Hindi”

कर्म पर विश्वास करने वाले संत कबीर दास भारत के महान संत थे जिनका जन्म वर्ष 1440 में हुआ था और वर्ष 1518 में देहांत हो गया था। इस्लाम धर्म के अनुसार कबीर का अर्थ महान होता है लेकिन कबीर हमेशा राम और अल्लाह को एक मानते थे दोनो भगवान के नाम मानते थे
कबीर पंथ एक धार्मिक समुदाय भी है जो संत मत के संप्रदाय के प्रवर्तक के रूप में कबीर की पहचान करता है। कबीर पंथ के सदस्यों को कबीर पंथियों के रूप में जाना जाता है
कबीर दास जी को जुलाहे के रूप में जाना जाता है लेकिन उनके जन्म को लेकर कई इतिहासकारो का अलग अलग मत है कई इतिहासकारो ने जिक्र किया है कि रामानन्द स्वामी एक ब्राहम्ण विधवा स्त्री को गलती से पुत्रवती का आशीर्वाद दे दिया
चूकि वो औरत विधवा थी समाज के डर से उसने बालक को एक ताल में फेंक दिया जो कि एक जुलाहा परिवार को मिल गया जिसका नाम नीरू और नीमा था
लेकिन कबीर जी के जीवन में हमें जाति और धर्म से उठकर सभी धर्म और संप्रदाय के लिए कहा इसिलिए सभी धर्म संप्रदाय के लोग उनका सम्मान करते है

Kabir Das के कुछ महान लेखन :

कबीर दास के कुछ महान लेखन निम्न है :

  • बीजक,
  • कबीर ग्रंथावली,
  • अनुराग सागर,
  • सखी ग्रन्थि

कबीर जी का धर्म :

कबीर जी के धर्म के लिए बहुत अलग अलग मत है कुछ इतिहासकार मुस्लिम तो कुछ इतिहासकार हिन्दु बताते है
कुछ भी स्पष्ट नहीं है लेकिन कबीर जी के जीवन यापन और उनके विचारो में दोनो धर्म की बाते सुनने में आती है कुछ इतिहासकार मुस्लिम जुलाहे के परिवार के बताते है लेकिन बाद में हिन्दु धर्म को ग्रहण कर लिया था संत कबीर दास जी को अपनी प्रभावशाली परंपराओं और संस्कृति के कारण दुनिया भर में प्रसिद्धि मिली।

Kabir Das कबीरदास जी के गुरू :

कई कबीर के दोहो में रामानन्द जी जिक्र आता है तो इतिहासकारो का मत है रामानन्द जी ही संत कबीर दास जी के गुरू थे इसके पीछे एक कहानी भी सुनने में आती है जिसमें यह कहा जाता है कि एक बार रामानन्द जी को पैर में चोट लगने की वजह से मुॅह से राम राम निकला तब से कबीर जी ने राम राम को ही अपने जीवन का मंत्र मान लिया

संत कबीरदास जयंती कब मनाते है :

संत कबीर दास की जयंती हिन्दू पचांग के अनुसार पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है, और अंग्रेजी कैलेन्डर के अनुसार यह मई जून के महीनों में मनाया जाता है. संत कबीर दास जयंती एक वार्षिक कार्यक्रम है, जो प्रसिद्ध संत, कवि और सामाजिक सुधारक कबीर दास के सम्मान में मनाया जाता है. यह पुरे भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है.

Kabir Das ke Dohe “कबीर दास जी के दोहे” :

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय॥

भावार्थ : Kabir Das कबीर दास जी इस दोहे में बड़े ही सुन्दर तरीके से गुरू और भगवान के बीच में चुनते है और कहते हैं कि अगर हमारे सामने गुरु और भगवान दोनों एक साथ खड़े हों तो आप किसके चरण स्पर्श करेंगे? गुरु ने अपने ज्ञान से ही हमें भगवान से मिलने का रास्ता बताया है इसलिए गुरु की महिमा भगवान से भी ऊपर है और हमें गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए।

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये ।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ।

भावार्थ : Kabir Das कबीर दास जी कहते हैं कि इंसान को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को बहुत अच्छी लगे। ऐसी भाषा दूसरे लोगों को तो सुख पहुँचाती ही है, इसके साथ खुद को भी बड़े आनंद का अनुभव होता है।

निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें ।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए ।

भावार्थ: Kabir Das कबीर दास जी कहते हैं कि निंदक हमेशा दूसरों की बुराइयां करने वाले लोगों को हमेशा अपने पास रखना चाहिए, क्यूंकि ऐसे लोग अगर आपके पास रहेंगे तो आपकी बुराइयाँ आपको बताते रहेंगे और आप आसानी से अपनी गलतियां सुधार सकते हैं। इसीलिए कबीर जी ने कहा है कि निंदक लोग इंसान का स्वभाव शीतल बना देते ह

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।
जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय ।


भावार्थ: कबीर दास Kabir Das ji जी कहते हैं कि मैं सारा जीवन दूसरों की बुराइयां देखने में लगा रहा लेकिन जब मैंने खुद अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई इंसान नहीं है। मैं ही सबसे स्वार्थी और बुरा हूँ भावार्थात हम लोग दूसरों की बुराइयां बहुत देखते हैं लेकिन अगर आप खुद के अंदर झाँक कर देखें तो पाएंगे कि हमसे बुरा कोई इंसान नहीं है।

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय ।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ।


भावार्थ: Kabir Das ke Dohe दुःख में हर इंसान ईश्वर को याद करता है लेकिन सुख में सब ईश्वर को भूल जाते हैं। अगर सुख में भी ईश्वर को याद करो तो दुःख कभी आएगा ही नहीं।

Kabir Das ke Dohe “कबीरदास के दोहे”

kabir ke dohe, delhi, 2020

Kabir Das ke Dohe “कबीरदास के दोहे”

तबही गुरु प्रिय बैन कहि, शीष बढ़ी चित प्रीत।
ते कहिये गुरु सनमुखां, कबहूँ न दीजै पीठ।।


भावार्थ शिष्य के मन में बढ़ी हुई प्यार और उद्गार देखकर ही गुरु मोक्षा का उपदेश करते हैं। अतः गुरु के सामने रहो यानि समुख रहो, कभी विमुख मत हो।

अबुध सुबुध सुत मातु पितु, सबहिं करै प्रतिपाल।
अपनी ओर निबाहिये, सिख सुत गहि निज चाल।।

भावार्थ मात – पिता निर्बुधि – बुद्धिमान सभी पुत्रों का प्रतिपाल करते हैं। पुत्र कि भांति ही शिष्य को गुरुदेव अपनी मर्यादा की चाल से निभाते हैं।

करै दूरी अज्ञानता, अंजन ज्ञान सुदये।
बलिहारी वे गुरु की हँस उबारि जु लेय।।


भावार्थ ज्ञान का अंजन लगाकर शिष्य के अज्ञान दोष को दूर कर देते हैं। उन गुरुजनों की प्रशंसा है, जो जीवो को भव से बचा लेते हैं।

साबुन बिचारा क्या करे, गाँठे वाखे मोय।
जल सो अरक्षा परस नहिं, क्यों कर ऊजल होय ।।


भावार्थ साबुन बेचारा क्या करे,जब उसे गांठ में बांध रखा है। जल से स्पर्श करता ही नहीं फिर कपडा कैसे उज्जवल हो। भाव – ज्ञान की वाणी तो कंठ कर ली, परन्तु विचार नहीं करता, तो मन कैसे शुद्ध हो।

गुरु सो ज्ञान जु लीजिये, सीस दीजये दान।
बहुतक भोंदू बहि गये, सखि जीव अभिमान।।

भावार्थ अपने सिर की भेंट देकर गुरु से ज्ञान प्राप्त करो परन्तु यह सीख न मानकर और तन, धनादि का अभिमान धारण कर कितने ही मूर्ख संसार से बह गये, गुरुपद – पोत में न लगे।

Kabir Das ke Dohe “कबीरदास के दोहे”

kabir ke dohe, delhi, 2020

Kabir Das ke Dohe “कबीरदास के दोहे”

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि.

भावार्थ जिसे बोल का महत्व पता है वह बिना शब्दों को तोले नहीं बोलता कबीीर दास जी कहते है कि कमान से छुटा तीर और मुंह से निकले शब्द कभी वापस नहीं आते इसलिए इन्हें बिना सोचे-समझे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए . जीवन में वक्त बीत जाता है पर शब्दों के बाण जीवन को रोक देते है . इसलिए वाणी पे नियंत्रण और मिठास का होना जरुरी है .

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह,
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥

भावार्थ कबीर दास जी इस दोहे Kabir Das ke Dohe में कहते हैं कि इस दुनियाँ में जिस व्यक्ति को पाने की इच्छा हैं उसे उस चीज को पाने की ही चिंता हैं, मिल जाने पर उसे खो देने की चिंता हैं वो हर पल बैचेन हैं जिसके पास खोने को कुछ हैं लेकिन इस दुनियाँ में वही खुश हैं जिसके पास कुछ नहीं, उसे खोने का डर नहीं, उसे पाने की चिंता नहीं, ऐसा व्यक्ति ही इस दुनियाँ का राजा हैं

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय,
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय॥

भावार्थ Kabir Das ji ke Dohe कबीर ने अपने इस दोहे में बहुत ही उपयोगी और समझने योग्य बात लिखी उन्होंने कहा है कि कुम्हार और उसकी कला को लेकर कहा हैं कि मिट्टी एक दिन कुम्हार से कहती हैं कि तू क्या मुझे कूट कूट कर आकार दे रहा हैं एक दिन आएगा जब तू खुद मुझ में मिल कर निराकार हो जायेगा अर्थात कितना भी कर्मकांड कर लो एक दिन मिट्टी में ही समाना हैं .

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

भावार्थ Kabir Das ji ke Dohe कबीर दास जी कहते हैं कि लोग सदियों तक मन की शांति के लिये माला हाथ में लेकर ईश्वर की भक्ति करते हैं लेकिन फिर भी उनका मन शांत नहीं होता इसलिये कवी कबीर दास कहते हैं दृ हे मनुष्य इस माला को जप कर मन की शांति ढूंढने के बजाय तू दो पल अपने मन को टटौल, उसकी सुन देख तुझे अपने आप ही शांति महसूस होने लगेगी .

तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय .
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

भावार्थ Kabir Das ji ke Dohe कबीर दास जी कहते हैं जैसे धरती पर पड़ा तिनका आपको कभी कोई कष्ट नहीं पहुँचाता लेकिन जब वही तिनका उड़ कर आँख में चला जाये तो बहुत कष्टदायी हो जाता हैं अर्थात जीवन के क्षेत्र में किसी को भी तुच्छ अथवा कमजोर समझने की गलती ना करे जीवन के क्षेत्र में कब कौन क्या कर जाये कहा नहीं जा सकता .

kabir ke dohe, delhi, 2020

भक्ति बीज पलटै नहीं, जो जुग जाय अनन्त
ऊँच नीच घर अवतरै, होय सन्त का सन्त

भावार्थ Kabir Ke dohe ईश्वर की हुई भक्ति के बीज निष्फल नहीं होती चाहे अनंतो युग बीत जाये भक्तिमान जीव सन्त का सन्त ही रहता है चाहे वह ऊँच – नीच माने गये किसी भी वर्ण – जाती में जन्म ले

भक्ति पदारथ तब मिलै, तब गुरु होय सहाय
प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय

भावार्थ Kabir Ke dohe भक्तिरूपी अमोलक वस्तु तब मिलती है जब यथार्थ सतगुरु मिलें और उनका उपदेश प्राप्त हो जो प्रेम – प्रीति से पूर्ण भक्ति है, वह पुरुषार्थरुपी पूर्ण भाग्योदय से मिलती है

भक्ति जो सीढ़ी मुक्ति की, चढ़ै भक्त हरषाय
और न कोई चढ़ि सकै, निज मन समझो आय

भावार्थ Kabir das dohe भक्ति मुक्ति की सीडी है, इसलिए भक्तजन खुशी – खुशी उसपर चदते हैं आकर अपने मन में समझो, दूसरा कोई इस भक्ति सीडी पर नहीं चढ़ सकता सत्य की खोज ही भक्ति है

भक्ति बिन नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय
शब्द सनेही होय रहे, घर को पहुँचे सोय

भावार्थ Kabir Das Dohe कोई भक्ति को बिना मुक्ति नहीं पा सकता चाहे लाखो लाखो यत्न कर ले जो गुरु के निर्णय वचनों का प्रेमी होता है, वही सत्संग द्वरा अपनी स्थिति को प्राप्त करता है

भक्ति गेंद चैगान की, भावै कोइ लै लाय
कहैं कबीर कुछ भेद नहिं, कहाँ रंक कहँ राय

भावार्थ भक्ति तो मैदान में गेंद के समान सार्वजनिक है, जिसे अच्छी लगे, ले जाये गुरु कबीर जी कहते हैं कि, इसमें धनी – गरीब, ऊँच – नीच का भेदभाव नहीं है

kabir amritwani

kabir ke dohe, delhi, 2020

kabir amritwani

लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार
कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार

भावार्थ घर की दूरी ज्यादा है मार्ग भी दुर्गम है और अनेको चोर उचके भी रास्ते में है तो भगवान् का दुर्लभ दर्शन कैसे प्राप्त हो? संसार में जीवन कठिन है अनेक बाधाएं हैं परेशानिया हैं उनमें पड़कर हम उलझे रहते हैं बहुत से माया हमें अपनी ओर खींचते रहते हैं हम अपना मंजिल भूलते रहते हैं अपनी धन गंवाते रहते हैं

इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूं जीव।
लोही सींचैं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव॥

भावार्थ इस शरीर को दिया बना लूं, उसमें प्राण की बत्ती डालूँ और खुन से तेल की तरह सींचूं और इस तरह दीपक जला कर मैं अपने प्रिय के मुख का दर्शन कब कर पाऊंगा? भगवान से लौ लगाना उसे पाने की चाह करना उसकी भक्ति में तन-मन को लगाना एक साधना है तपस्या है दृ जिसे कोई कोई बड़ा विरला ही कर पाता है !

नैना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ।
ना हौं देखूं और को न तुझ देखन देऊँ॥

भावार्थ हे प्रिय प्रभु तुम इन दो आॅखो की राह से मेरे अंदर आ जाओ और फिर मैं अपने इन आखों के कपाटं को बंद कर लूं ! फिर न तो मैं किसी अन्य को देखूं और न ही किसी और को आपको देखने दूं !

कबीर रेख सिन्दूर की काजल दिया न जाई।
नैनूं रमैया रमि रहा दूजा कहाँ समाई ॥

भावार्थ कबीर दास जी कहते हैं कि जहां सिन्दूर की रेखा है वहां काजल नहीं दिया जा सकता. जब आखों में राम विराज रहे हैं तो वहां कोई अन्य कैसे निवास कर सकता है ?

कबीर सीप समंद की, रटे पियास पियास ।
समुदहि तिनका करि गिने, स्वाति बूँद की आस ॥

भावार्थ कबीर कहते हैं कि समुद्र की सीपी प्यास प्यास रटती रहती है. स्वाति नक्षत्र की बूँद की आशा लिए हुए समुद्र की अपार जलराशि को तिनके के बराबर समझती है. हमारे मन में जो पाने की ललक है जिसे पाने की लगन है, उसके बिना सब निस्सार है.

kabir amritwani

kabir dohe, delhi, 2020

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फल कारन सेवा करे , करे ना मन से काम
कहे कबीर सेवक नहीं , चाहे चैगुना दाम

भावार्थ जो ईश्वर की सेवा के लिए कुछ नहीं कर रहा है। वह जो कुछ भी करता है उसके बदले में चार गुना उम्मीद लगाए रहता है। वह भगवान का भक्त नहीं है।

कबीरा यह तन जात है , सके तो ठौर लगा
कई सेवा कर साधू की, कई गोविन्द गुण गा

भावार्थ कबीर कहते हैं कि हमारा यह शरीर मृत्यु के करीब पहुंच रहा है। हमें कुछ सार्थक करना चाहिए। हमें अच्छे लोगों की सेवा करनी चाहिए। हमें भगवान के गुण को याद रखना चाहिए।

सोना सज्जन साधू जन , टूट जुड़े सौ बार
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एइके ढाका दरार

भावार्थ अच्छे लोगों को फिर से अच्छा होने में समय नहीं लगेगा, भले ही उन्हें दूर करने के लिए कुछ किया जाए। वे सोने के जैसे हैं और सोना लचीला है और भंगुर नहीं है। लेकिन दुर्जन व्यक्ति कुम्हार द्वारा बनाया गया मिट्टी का बर्तन जैसा होता है जो भंगुर होता है और एक बार टूट जाने पर वह हमेशा के लिए टूट जाता है।

जग में बैरी कोई नहीं , जो मन शीतल होय
यह आपा तो डाल दे , दया करे सब कोए

भावार्थ अगर हमारा दिमाग शांत है तो दुनिया में कोई दुश्मन नहीं हैं। अगर हमारे पास अहंकार नहीं है तो सभी हमारे लिए दयालु हैं।

प्रेमभाव एक चाहिए , भेष अनेक बनाय
चाहे घर में वास कर , चाहे बन को जाए

भावार्थ आप घर पर रह सकते हैं या आप जंगल जा सकते हैं। यदि आप ईश्वर से जुड़े रहना चाहते हैं, तो आपके दिल में प्यार होना चाहिए।

kabir ke dohe

कबीर दास, 2020

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कबीर यह संसार है, जैसा सेमल फूल
दिन दस के व्येवहार में, झूठे रंग न भूले

भावार्थ गुरु कबीर जी कहते हैं कि इस संसार की सभी माया सेमल के फूल के भांति केवल दिखावा है अतः झूठे रंगों को जीवन के दस दिनों के व्यवहार एवं चहल – पहल में मत भूलो

कबीर खेत किसान का, मिरगन खाया झारि
खेत बिचारा क्या करे, धनी करे नहिं बा
रि

भावार्थ गुरु कबीर जी कहते हैं कि जीव – किसान के सत्संग – भक्तिरूपी खेत को इन्द्रिय – मन एवं कामादिरुपी पशुओं ने एकदम खा लिया द्य खेत बेचारे का क्या दोष है, जब स्वामी – जीव रक्षा नहीं करता

कबीर रस्सी पाँव में, कहँ सोवै सुख चैन
साँस नगारा कुंच का, है कोइ राखै फेरी

भावार्थ अपने शासनकाल में ढोल, नगाडा, ताश, शहनाई तथा भेरी भले बजवा लो अन्त में यहाँ से अवश्य चलना पड़ेगा, क्या कोई घुमाकर रखने वाला है

आज काल के बीच में, जंगल होगा वास
ऊपर ऊपर हल फिरै, ढोर चरेंगे घास

भावार्थ आज – कल के बीच में यह शहर जंगल में जला या गाड़ दिया जायेगा फिर इसके ऊपर ऊपर हल चलेंगे और पशु घास चरेंगे

रात गँवाई सोयेकर, दिवस गँवाये खाये
हीरा जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाय

भावार्थ मनुष्य ने रात गवाई सो कर और दिन गवाया खा कर, हीरे से भी अनमोल मनुष्य योनी थी परन्तु विषयरुपी कौड़ी के बदले में जा रहा है

kabir ke dohe with meaning in hindi language

कबीर दास, 2020

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मन के हारे हार है मन के जीते जीत ।
कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत ॥

भावार्थ जीवन में जय हार केवल मन की भावनाएं हैं.यदि मनुष्य मन में हार गया या निराश हो गया तो हार है और यदि उसने मन को जीत लिया तो वह विजेता है. ईश्वर को भी मन के विश्वास से ही पा सकते हैं यदि प्राप्ति का भरोसा ही नहीं तो कैसे पाएंगे?

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहीं ।
प्रेम गली अति सांकरी जामें दो न समाहीं ॥

भावार्थ जब तक मन में अहम था यानि अहंकार था तब तक ईश्वर का साक्षात्कार न हुआ. जब अहंकार समाप्त हुआ तभी प्रभु मिले. जब प्रभु का साक्षात्कार हुआ दृ तब अहंकार अपने आप ही नष्ट हो गया. प्रभु की सत्ता का ज्ञान तभी हुआ जब अहंम गया. प्रेम में द्वैत भाव नहीं हो सकता प्रेम की संकरी पतली गली में एक ही समा सकता है अहम् या परम ! परम की प्राप्ति के लिए अहम् का विसर्जन आवश्यक है.

पढ़ी पढ़ी के पत्थर भया लिख लिख भया जू ईंट ।
कहें कबीरा प्रेम की लगी न एको छींट॥

भावार्थ ज्ञान से बड़ा प्यार है बहुत ज्ञान हासिल करके यदि मनुष्य पत्थर सा कठोर हो जाए, ईंट जैसा निर्जीव हो जाए तो क्या पाया? यदि ज्ञान मनुष्य को रूखा और कठोर बनाता है तो ऐसे ज्ञान का कोई लाभ नहीं. जिस मानव मन को प्रेम ने नहीं छुआ, वह प्रेम के अभाव में जड़ हो रहेगा. प्रेम की एक बूँद एक छींटा भर जड़ता को मिटाकर मनुष्य को सजीव बना देता है.

साधु भूखा भाव का धन का भूखा नाहीं ।
धन का भूखा जो फिरै सो तो साधु नाहीं ॥

भावार्थ साधु का मन भाव को जानता है, भाव का भूखा होता है, वह धन का लोभी नहीं होता जो धन का लोभी है वह तो साधु नहीं हो सकता !

पढ़े गुनै सीखै सुनै मिटी न संसै सूल।
कहै कबीर कासों कहूं ये ही दुःख का मूल ॥

भावार्थ बहुत सी पुस्तकों को पढ़ा गुना सुना सीखा पर फिर भी मन में गड़ा संशय का काँटा न निकला कबीर दास जी कहते हैं कि किसे समझा कर यह कहूं कि यही तो सब दुखों की जड़ है दृ ऐसे पठन मनन से क्या लाभ जो मन का संशय न मिटा सके?

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कबीर दास, 2020

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प्रेम न बाडी उपजे प्रेम न हाट बिकाई ।
राजा परजा जेहि रुचे सीस देहि ले जाई ॥

भावार्थ प्रेम खेत में नहीं उपजता प्रेम बाजार में नहीं बिकता चाहे कोई राजा हो या साधारण प्रजा यदि प्यार पाना चाहते हैं तो वह आत्म बलिदान से ही मिलेगा. त्याग और बलिदान के बिना प्रेम को नहीं पाया जा सकता. प्रेम गहन- सघन भावना है खरीदी बेचे जाने वाली वस्तु नहीं !

कबीर सोई पीर है जो जाने पर पीर ।
जो पर पीर न जानई सो काफिर बेपीर ॥

भावार्थ कबीर कहते हैं कि सच्चा पीर संत वही है जो दूसरे की पीड़ा को जानता है जो दूसरे के दुःख को नहीं जानते वे बेदर्द हैं निष्ठुर हैं और काफिर हैं.

हाड जले लकड़ी जले जले जलावन हार ।
कौतिकहारा भी जले कासों करूं पुकार ॥

भावार्थ दाह क्रिया में हड्डियां जलती हैं उन्हें जलाने वाली लकड़ी जलती है उनमें आग लगाने वाला भी एक दिन जल जाता है. समय आने पर उस दृश्य को देखने वाला दर्शक भी जल जाता है. जब सब का अंत यही हो तो पनी पुकार किसको दू? किससे गुहार करूं दृ विनती या कोई आग्रह करूं? सभी तो एक नियति से बंधे हैं ! सभी का अंत एक है !

रात गंवाई सोय कर दिवस गंवायो खाय ।
हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय ॥

भावार्थ रात सो कर बिता दी, दिन खाकर बिता दिया हीरे के समान कीमती जीवन को संसार के निर्मूल्य विषयों की दृ कामनाओं और वासनाओं की भेंट चढ़ा दिया दृ इससे दुखद क्या हो सकता है ?

मन मैला तन ऊजला बगुला कपटी अंग ।
तासों तो कौआ भला तन मन एकही रंग ॥

भावार्थ बगुले का शरीर तो उज्जवल है पर मन काला दृ कपट से भरा है दृ उससे तो कौआ भला है जिसका तन मन एक जैसा है और वह किसी को छलता भी नहीं है.

कबीर हमारा कोई नहीं हम काहू के नाहिं ।
पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं ॥

भावार्थ इस जगत में न कोई हमारा अपना है और न ही हम किसी के ! जैसे नांव के नदी पार पहुँचने पर उसमें मिलकर बैठे हुए सब यात्री बिछुड़ जाते हैं वैसे ही हम सब मिलकर बिछुड़ने वाले हैं. सब सांसारिक सम्बन्ध यहीं छूट जाने वाले हैं

कबीर दास ke dohe , 2020

कबीर हमारा कोई नहीं हम काहू के नाहिं ।
पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं ॥

भावार्थ कबीर दास जी इस दोहे में कहते है कि इस संसार में न कोई हमारा अपना है और न ही हम किसी के है ! जैसे नांव के नदी पार पहुँचने पर उसमें मिलकर बैठे हुए सब यात्री बिछुड़ जाते हैं वैसे ही हम सब मिलकर बिछुड़ने वाले हैं. सब सांसारिक सम्बन्ध यहीं छूट जाने वाले हैं

देह धरे का दंड है सब काहू को होय ।
ज्ञानी भुगते ज्ञान से अज्ञानी भुगते रोय॥

भावार्थ देह धारण करने का दंड भोग या प्रारब्ध निश्चित है जो सब को भुगतना होता है. अंतर इतना ही है कि ज्ञानी या समझदार व्यक्ति इस भोग को या दुःख को समझदारी से भोगता है निभाता है संतुष्ट रहता है जबकि अज्ञानी रोते हुए दुखी मन से सब कुछ झेलता है !

हीरा परखै जौहरी शब्दहि परखै साध ।
कबीर परखै साध को ताका मता अगाध ॥

भावार्थ कबीर दास जी कहते है कि हीरे की परख जौहरी जानता है शब्द के सारदृ असार को परखने वाला विवेकी साधु सज्जन होता है . कबीर कहते हैं कि जो साधु साधु को परख लेता है उसका मत अधिक गहन गंभीर है !

एकही बार परखिये ना वा बारम्बार ।
बालू तो हू किरकिरी जो छानै सौ बार॥

भावार्थ किसी व्यक्ति को बस ठीक ठीक एक बार ही परख लो तो उसे बार बार परखने की आवश्यकता न होगी. रेत को अगर सौ बार भी छाना जाए तो भी उसकी किरकिराहट दूर न होगी दृ इसी प्रकार मूढ़ दुर्जन को बार बार भी परखो तब भी वह अपनी मूढ़ता दुष्टता से भरा वैसा ही मिलेगा. किन्तु सही व्यक्ति की परख एक बार में ही हो जाती है !

पतिबरता मैली भली गले कांच की पोत ।
सब सखियाँ में यों दिपै ज्यों सूरज की जोत ॥

भावार्थ कबीर दास जी कहते है पतिव्रता स्त्री यदि तन से मैली भी हो भी अच्छी लगती है. चाहे उसके गले में केवल कांच के मोती की माला ही क्यों न हो. फिर भी वह अपनी सब सखियों के बीच सूर्य के तेज के समान चमकती है !

kabir saheb ke dohe

कबीर दास ke dohe , 2020

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ॥

भावार्थ कबीर दास जी कहते है कि खजूर के पेड़ के समान बड़ा होने का क्या लाभ जब वो, ना ठीक से किसी को छाँव दे पाता है और न ही उसके फल सुलभ होते हैं और उसकी ओट लेकर पंछी बैठ भी नहीे सकता क्योकि उसकी छाया भी उसे नहीं लगेगी

हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह।
सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेंह॥

भावार्थ कबीर दास जी अपनी कबीर अमृतवाणी में कहते है कि पानी के स्नेह को हरा वृक्ष ही जानता है.सूखा काठ दृ लकड़ी क्या जाने कि कब पानी बरसा? अर्थात सहृदय ही प्रेम भाव को समझता है. निर्मम मन इस भावना को क्या जाने ?

झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह।
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह॥

भावार्थ बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे. इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा.

कहत सुनत सब दिन गए, उरझी न सुरझ्या मन।
कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन॥

भावार्थ कहते सुनते सब दिन बीत गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया ! कबीर कहते हैं कि यह मन अभी भी होश में नहीं आता. आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के ही समान है.

कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण।
कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण॥

भावार्थ बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे. इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना

kabir saheb ke dohe

कबीर दास ke dohe , 2020

ऊँचा महल चुनाइया, सुबरन कली दुलाय
वे मंदिर खाली पड़े रहै मसाना जाय

भावार्थ स्वर्णमय बेलबूटे ढल्वाकर, ऊँचा मंदिर चुनवाया वे मंदिर भी एक दिन खाली पड़ गये, और मंदिर बनवाने वाले श्मशान में जा बसे

कहा चुनावै भेड़िया, चूना माटी लाय
मीच सुनेगी पापिनी, दौरी के लेगी आप

भावार्थ चूना मिट्ठी मँगवाकर कहाँ मंदिर चुनवा रहा है ? पापिनी मृत्यु सुनेगी, तो आकर धर – दबोचेगी

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